Waiting for Shiva

చరిత్ర ఒక బరువు, ఒక బాధ్యత. ఆ బరువుబాధ్యతలను హుందాగా అలవోకగా మోస్తూ వచ్చిన న గరం కా శీ లే దా వా రణాసి. ప్ర పంచానికి వె లుగు చూ పిన ఈ దే శసంస్ కృతికి విలువైన ప్ర తీక. శతాబ్దా లుగా ఎదుర్కొన్న కష్టా లను, దాడులను భరిస్తూ , ఎదిరిస్తూ తలెత్తు కు నిలిచిన నగరం కాశీ.

 

“వెయిటింగ్ ఫర్ శివ: అనెర్తిం గ్ ది ట్రూ త్ ఆఫ్ కాశీస్ గ్యానవాపి” కు తెలుగు అనువాదం ఇది. శ కలాలుగా వు న్న చ రిత్ర ను ఒ క సూత్రం గా కూ ర్చిన ర చన, వి శ్వేశ్వరుడిగా విశ్వనాథుడిగా అనాదిగా ఈ జాతిని తరిం పచేస్తు న్న పరమేశ్వరుడి నివాసమై న కాశీ కథ ఇది. ‘కాశీలో తుది శ్వాస విడిస్తే చాలు ముక్తినిస్తా’ అని శివుడు స్వయంగా ప్ర కటించాడు. శతాబ్దా లుగా కాశీ పొందిన గౌరవమర్యాదలు, ముష ్కరుల దాడుల్లో శిథిలమై న కాశీ వ్యథలు, పడిన ప్ర తిసారీ కాశీని మళ్లీ లేపిన అచంచలమై న భక్తిప్ర పత్తు లు అన్నీ పేజీలలో మనను పలకరిస్తా యి. దెబ్బలు తినడం కాశీకి అలవాటే, అయితే చావుదెబ్బ కొట్టిం ది మటుకు 1669 లో ఔరంగజేబ్. ఆలయం ధ్వం సం చేసి, పడమటి గోడ మీద రెండు గుంబజ్ లు కట్టి, దాన్ని మసీదు అన్నా డు. గ్యా నవాపి మసీదు ఉన్న స్థ లం, ఆవరణ, 18 వ శతాబ్దం లో కట్టిన మందిరానికి మసీదుకు మధ్యలోని స్థ లం మొత్తం వివాదాలకు కారణమయ్యాయి. గంగ నెత్తు రు పులుముకుని రోదించిం ది. బ్రిటి ష్ హయాం లో ఎన్ని వ్యాజ్యా లలో తీర్పులు ప్ర కటించి నా పరిష్కారం లేకపోయిం ది. 1947 తరవాత కాశీ మందిరానికి స్వేచ్ఛ తేవాలన్న సంకల్పం మరిం త బలమై ంది. 2021 లోనమోదై న సివిల్ కేసు దేశాన్ని ఒక ఊపు ఊపగా, సుప్ర ీం కోర్టు ASIని సమగ్ర నివేదిక సమర్పిం చమని కోరిం ది. 2024 జనవరిలో బయటకు వచ్చిన ASI నివేదిక ఏం చెబుతోంది?

 

గ్యా నవాపి రహస్యాలను ఎంతో వివరంగా, ఆసక్తికరంగా, వివరిం చారు విక్ర మ్ సంపత్. పాఠకుల మనసు గెలుచుకునే, ఆలోచింపచేసే రచన. ఇదిగో, తెలుగులో మీకోసం.

Ram Janmabhoomi

 जो सभ्यता अपने संघर्षों को भूल जाती है, वह अपनी गलतियों की पुनरावृत्ति और आत्मविनाश के दुश्चक्र ें फंसने को अभिशप्त होती है। स्वतंत्रता की लड़ा, िपत्य तथा अत्याचारों के िलाफ प्रतिरो अक्सर साहिक स्मृियों से गाब हो जाते हैं और उत्पीड़न की बोझ तले, नगढ़ंत कथाओं द्वारा हिंदू पहचान को मिटाने के व्यवस्थित प्रासों के ाध्यसे उन स्मृियों की चुंली कर दी जाती हैं। भारत की पवित्र भौगोलिक संरचना, हिंदू धर्म के उद्ग्थल और हिंदू लोगों की पैतृक भूमि, लगातार हुए आक्रणों के साक्षी हैं, जिसने साहिानस पर अमिट घाव छोड़े हैं। 

 

रा जन्मभूमि आंदोलन हिंदू सभ्यता की जड़ों पर हुए प्रहार और इसे पुनः प्राप्त करने के दुर्धर्ष संघर्ष का एक जीवंत एवं र्मिक दस्तावेज है। शस्त्र आारित आख्यानों के प्रभुत्व वाले ुग ें, जहां अत्याचार करने वालों को पीड़ित का और पीड़ितों को उत्पीड़क का ताज पहनाा जाता है, ह पुस्तक आंदोलन के उदात्त संघर्ष ें अनगिनत हिंदुओं के अश्रु, ्वेद और रक्त से लिखी बेबाक सच्चाों का स्मरण कराती है। ह पुस्तक इस बात की अनुस्मािका भी है कि इस ुग ें जन्मा प्रत्येहिंदू, उन विपदाओं, कष्टों और उन लोगों द्वारा किए गए बलिदानों को कभी न भूले जो उनसे पहले हुए हैं। यदि जानेअनजाने भूल जाते हैं, तो अपनी हान सभ्यता के विनाश के भागीदार होंगे। 

देवदूत

कहानी संग्रह के रूप में प्रस्तुतदेवदूतऐसी सच्ची घटनाओं का संग्रह है जिनमें जीवन से निराश व हताश लोगों के जीवन में एक अप्रत्याशित मोड़ आता है और किसी व्यक्ति के सहयोग से उनका नारकीय व दुखद जीवन सुख की लालिमा को देखने लगता है। देवदूत की कहानियों में वे ही घटनाएं चित्रित की गई हैं जो उन पात्रोंसे साक्षात्कार करते समय मुझे बतलाई गईं। 

 

इन कहानियों को खोजते हुए मैंने मानव विषाद व वंचनाओं को अति निकट से देखा एवं मेरी लेखनी ने उन सभी मार्मिक अनुभवों को एक क्रम में सजाने की कोशिश की है। 

 

देवदूत में एक ऐसे ही व्यक्ति के जनकल्याणकारी कार्यों का वर्णन है, जिनसे पीड़ितों व उपेक्षित लोगों को उनके बुरे समय में इलाज, वित्तीय सहायता, सम्मान, सुरक्षा, भोजन, वस्त्र, योजनाओं का लाभ आदि प्राप्त हुई और उनके जीवन का विषाद अचानक से कम हो गया। 

 

जैसेजैसे आप इस पुस्तक के पन्नों में चित्रित उन सच्ची घटनाओं को पढ़ेंगे, वैसेवैसे आपको उन पीड़ितों की पीड़ा और उनकी पीड़ा को हरने के लिए उनके जीवन में आये देवदूत के जनपरोपकारी कार्यों के बारे में पता चलेगा। 

प्रतीक्षा शिवाची

ज्या सहजतेने काशी किंवा वाराणसी आपल्या इतिहासाचे प्रचंड ओझे वाहते, तशी जगातील फार थोडी ठिकाणे असतील. ही नगरी आपल्या संस्कृतीच्या आत्म्याचे आणि शतकानुशतके आलेली विपरीत परिस्थिती, हल्ले सहन करूनही पुन्हापुन्हा उभी राहत आपल्या अपराजित वृत्तीचे दर्शन घडवते. 

 

 प्रतीक्षा शिवाचीकाशीज्ञानवापीच्या सत्याचा शोधया पुस्तकाच्या माध्यमातून विश्वेश्वर किंवा विश्वनाथाच्या रुपातील शिवाचा अधिवास असणाऱ्या काशीचा इतिहास, तिची प्राचीनता आणि पावित्र्याचे दर्शन घडते. जो या शहरात आपला देह ठेवतो त्याला मोक्ष मिळेल असे वचन प्रत्यक्ष शिव देतो. हे पुस्तक या स्वयंभू ज्योतिर्लिंग विश्वेश्वराच्या इतिहासाचा सखोल शोध घेते. आपल्या भक्तांचे आश्रयस्थान असलेले हे विश्वेश्वर मंदिर हे नेहमीच धर्मांध मूर्तीभंजकांच्या निशाण्यावर राहिलेले आहे. परंतु जेव्हा जेव्हा हे मंदिर उद्ध्वस्त करून त्याचे अस्तित्व पुसून टाकण्याचा प्रयत्न झाला तेव्हा तेव्हा हे मंदिर पुन्हा उभे राहिले आणि भरभराटीला आले. 

 

मंदिराच्या इतिहासातील या प्रलयंकारी घटनांचा लेखाजोखाप्रतीक्षा शिवाचीहे पुस्तक मांडते. जुलमी मुघल बादशाह औरंगजेबाने १६६९ मध्ये या मंदिरावर घातलेला घाव वर्मी बसला आहे. त्याने मंदिर फोडले आणि मंदिराच्या पश्चिमेकडील अर्धवट तुटलेल्या भिंतीवर घुमट उभे करून त्याला मशिदीचे रूप दिले. आज ज्याला ज्ञानवापी मशीद म्हणतात ती मशीद आणि त्याच्या आजूबाजूची आणि अठराव्या शतकात बांधल्या गेलेल्या नव्या विश्वनाथ मंदिराजवळची जागा यावरून नेहमीच वादंग माजलेला आहे. भूतकाळात या मुद्द्यावरून अनेक वेळा रक्तरंजित दंगली झाल्या आहेत. इंग्रजी सत्तेच्या काळातही या जमिनीच्या मालकी आणि ताब्याच्या मुद्द्यावरून अनेक वेळा ब्रिटिश न्यायालयांचे दरवाजे ठोठावले गेले आहेत, त्यासंबंधीचे खटले चालवले गेले आहेत. स्वातंत्र्यानंतरही हा पूर्ण परिसर मुक्त करावा अशी मनीषा हिंदूंच्या मनात कायमच वास करत आली आहे. २०२१ ला नव्याने दाखल करण्यात आलेल्या एका खटल्याने या फार काळापासून ठसठसणाऱ्या जखमेवरची खपली निघाली. भारतीय पुरातत्व विभागाकडून सर्वेक्षण होऊ नये यासाठी अगदी सर्वोच्च न्यायालयापर्यंत वारंवार अपीले करूनही हे सर्वेक्षण झाले आणि जानेवारी २०२४ मध्ये या सर्वेक्षणाने या पूर्ण प्रकरणातील सत्य उजेडात आणले. 

 

विक्रम संपतचे हे नवे पुस्तक या मंदिराचा बहुपेडी इतिहास, त्यात आलेली नाट्यमय वळणे, घडलेल्या गूढ घडामोडी, या जागेवरून झालेले कडाक्याचे वादविवाद या साऱ्या गोष्टी उलगडून दाखवते. कितीतरी काळ ज्ञानवापीमध्ये दडपून आणि लपवून ठेवलेल्या या गुपितांना या पुस्तकाच्या रूपाने वाचा फुटली आहे.

प्रतीक्षा शिव की ज्ञान वापी काशी के सत्य का उद्घाटन

दुनिया में कुछ ही ऐसी जगहें हैं जो इतनी सहजता से इतिहास का भार वहन कर पाती हैं, जितना काशी या वाराणसी ने किया है। यह पवित्र शहर हमारी सभ्यता की आत्मा का प्रतीक है और उस लचीलेपन का प्रतीक है जो हमने सदियों से कई प्रतिकूलताओं और घातक हमलों का सामना करते हुए प्रदर्शित किया है।

 

‘प्रतीक्षा शिव की: ज्ञान वापी काशी के सत्य का उद्घाटन’ विश्वेश्वर या विश्वनाथ रूपी भगवान शिव की निवास स्थली के रूप में काशी के इतिहास, प्राचीनता और पवित्रता को पुनः प्रस्तुत करती है। शिव ने स्वयं अपने भक्तों को आश्वासन दिया था कि यदि वे अपनी नश्वर कुण्डली का इस शहर में करेंगे तो उन्हें मोक्ष प्राप्त होगा। यह पुस्तक विश्वेश्वर के इस स्वयं-प्रकट स्वयंभू ज्योतिर्लिंग मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डालती है, जो सदियों से भक्तों के लिए शरणस्थली भी रही है और मूर्तिभंजन की रक्तरंजित लहरों का लक्ष्यभी रही है। हालाँकि, जब भी मंदिर को ध्वस्तकर उसे नष्ट करने का प्रयास किया गया, यह और भी तीव्र उत्थान तथा वैभव के साथ लोकजीवन के समक्ष प्रकट हुआ।

 

यह पुस्तक मंदिर के इतिहास में घटित इन प्रलयकारी घटनाओं का दस्तावेजीकरण करती है। मंदिर को अंतिम आघात 1669 में मुगल शासक औरंगज़ेब द्वारा दिया गया, जिसने मंदिर को खंडित कर, इसे मस्जिद कहे जाने के लिए आंशिक रूप से नष्ट हुई पश्चिमी दीवार पर कुछ गुंबद खड़े कर दिए। वह क्षेत्र जिसे अब ज्ञान वापी मस्जिद कहा जाता है और आसपास की भूमि जो कि विश्वनाथ के नए मंदिर के निकट स्थित है, 18वीं शताब्दी के अंत में बनी थी तथा यह हमेशा से तीव्र विवाद का विषय रही है। इस मुद्देको लेकर वाराणसी में पहले भी कई बार खूनी दंगे हो चुके हैं। औपनिवेशिक युग के दौरान, क़ब्ज़े के मुद्दे को निपटाने के लिए ब्रिटिश अदालतों के दरवाजे खटखटाए गए और उन्होंने कई बार इस मामले पर अपना निर्णय भी दिया। स्वतंत्रता के बाद भी, इस परिसर को ‘मुक्त’ कराने की इच्छा हिंदू मन-मानस में पनपती रही है। ऐसे में वाराणसी सिविल कोर्ट के समक्ष 2021 में दायर एक नए मुकदमे ने लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक घाव को फिर से हरा कर दिया। याचिका को खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई अपीलों के बावजूद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को इस परिसर के सर्वेक्षण का आदेश दिया गया, जिसने जनवरी 2024 में अपने निष्कर्षों के माध्यम से सच्चाई को उजागर किया।

 

विक्रम संपत की यह नवीनतम पेशकश इस विवादित स्थल के लंबे इतिहास और इस प्राचीन मंदिर के विचित्र अतीत में आए नाटकीय मोड़ और बदलावों की याद दिलाती है। ज्ञान वापी में लंबे समय से दबे हुए रहस्यों को अंततः इस पुस्तक के माध्यम से आवाज मिलती है।

Probashir Golpo Songroho

When suave writing is interwoven with simplicity, then we get a book like Probashir Golpo Shongroho. A collection of 21 stories from the author of the much-appreciated autobiography, Jana Awjanar Majhe, they peek into the author’s life, his thoughts, and his soul. The stories are layered beauties – how else would you explain a horror story speaking of ‘sorry is still so tough to say’ or the tale of how the author had gotten saved from many neardeath experiences talking subtly about ‘when the Lord protects us, we can defy death’. Each story is not more than three to four pages long, but the music that he plays with the words, moving from one note to another, surprising the reader with the unexpected, shows the deftness of the author’s writing skills. He might be a fan of the stalwarts of Bengali literature, but he, himself, is definitely one too.

HINDUS IN HINDU RASHTRA (Marathi Edition)

To those who claim we are now living in a totalitarian, fascist, Hindu Rashtra, one must ask: What kind of a Hindu Rashtra is this where a billion-strong Hindus have been, through our parliament, through our courts, our education system, and our constitution, reduced to not just second-class but, rather, eighth-class citizens? What kind of Hindu Rashtra is this where Ram Navami, Hanuman Jayanti, Durga pooja processions, and even Garba celebrations, are attacked and stoned with impunity? What kind of Hindu Rashtra is this where a sitting Prime minister says minorities have the first right to resources? What kind of Hindu Rashtra is this where Hindus are forced to be refugees in their own land, where one can settle 40,000 Rohingya Muslims but not 700,000 Kashmiri Hindus, the land’s original inhabitants; where the judiciary says it is too late to prosecute those who raped, murdered, and ethnically cleansed lacs of Hindus? What kind of Hindu Rashtra is this where Hindu temples are exclusively controlled by the State, where Hindus must beg for Waqf land to celebrate their festival while the government usurps hundreds of thousands of acres of temple land and is responsible for more than 100,000 temples losing lacs of crores in rental income? What kind of Hindu Rashtra is this where Right to Education Act discriminates only against Hindus and their schools, forcing tens of thousands of them to shut down? What kind of Hindu Rashtra is this where monsters like Aurangzeb and Tipu who perpetrated large-scale Hindu genocides are eulogised through State sponsored publications, naming of roads and cities, and organising of festivals? What kind of Hindu Rashtra is this where a law was about to be enacted through with only the Hindus would have been held guilty in a communal riot even if they were in a minority for example in Kashmir? What kind of Hindu Rashtra is this where court judgments like the Sabarimala and legislative enactments like the Hindu Code Bill purport to reform only Hindu religious practices but dare not touch practices of other religions, and if they do, the decisions are promptly reversed like in the Shah Bano case? What kind of Hindu Rashtra is this where The Places of Worship Act continues to deny the Hindus their legitimate right to correct historical injustices and reclaim thousands of demolished temples? What kind of Hindu Rashtra is this where the Waqf Act gives overarching powers to Muslims to declare a 1500-year-old Hindu temple to be on Islamic land when Islam is only 1300 years old? If this is how a Hindu is rewarded in a Hindu Rashtra, he’d much rather be in a Muslim Rashtra because then at least there’d be no pretence of equality – a Kafir will get what he deserves. In this searing commentary penned with clinical precision, the author shreds to smithereens once and for all the guilt-tripping, self-loathing fake narrative that Hindus have been duped with since Independence. There is no pretence, no political correctness, only unvarnished truth – that the Hindus are living under State-sanctioned Apartheid.

हिन्दू राष्ट्र: हिन्दुओं की रामकहानी

जो यह दावा करते हैं कि हम एक अधिनायकवादी हिंदू राष्ट्र में रह रहे हैं उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि यह किस प्रकार का हिंदू राष्ट्र है जहां एक अरब शक्तिशाली हिंदू यहाँ की संसद, अदालतों, शिक्षा व्यवस्था और हमारे संविधान द्वारा न सिर्फ दोयम दर्जे के नागरिक करार दिए गए हैं बल्कि उससे भी नीचे धकेल दिए गए? यह कैसा हिंदू राष्ट्र है जिसमें दुर्गा पूजा और गरबा के आयोजनों पर बेरोकटोक पत्थरबाजी की जाती है और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा एक शख्स कहता है कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है? यह कैसा हिंदू राष्ट्र है जहाँ हिंदुओं को अपनी ही धरती पर शरणार्थियों की तरह रहना पड़ता है और जहाँ कोई 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को तो बसा सकता है लेकिन इसी देश के धरतीपुत्र 7 लाख कश्मीरी पंडितों को नहीं और जहाँ अदालतों का कहना हैं कि हिंदुओं की हत्या, बलात्कार और जातीय संहार करने वालों पर मुकदमा चलाने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ हिंदुओं के मंदिर सरकारों के कब्जे में हैं और अपने त्यौहार मनाने के लिए हिंदुओं को वक्फ बोर्ड के सामने जमीन के लिए हाथ फैलाने पड़ते हैं? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ शिक्षा का अधिकार अधिनियम में केवल हिंदुओं के स्कूलों के साथ भेदभाव किया जाता है और उन्हें ताला लगाने को मजबूर कर दिया जाता है? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहां औरंगज़ेब और टीपू जैसे बर्बर शासकों को लेकर सरकारी खर्चे पर प्रकाशन किए जाते हैं, सड़कों के नाम रखे जाते हैं और त्योहारों का आयोजन होता है? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ एक ऐसा कानून बिल्कुल बन ही जाने ही वाला था जिसमें केवल हिंदुओं को, जबकि वे अल्पसंख्यक थे, सांप्रदायिक दंगों के लिए दोषी ठहराया जाता जैसा कि कश्मीर में देखा गया? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ सबरीमाला प्रकरण में अदालतों के फैसले और विधायी कानून केवल हिंदुओं के धर्माचारों में सुधार के लिए किए जाएँ लेकिन दूसरे धर्म को छुआ तक न जाए और अगर ऐसा कोई करे भी, तो वहाँ शाहबानो के मामले की तरह फैसले को पलट दिया जाए? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ हिंदू पूजा स्थल अधिनियम आज भी हिंदुओं को उनके प्रति हुए ऐतिहासिक अन्यायों को दुरुस्त करने के उनके विधिसम्मत अधिकार पर रोक लगता है जबकि वक्फ एक्ट मुसलमानों को एक 1500 वर्ष पुराने हिंदू मंदिर को इस्लामी संपदा घोषित करने की अनियंत्रित शक्ति दे देता है, गो कि इस्लाम अपने आप में महज 1300 वर्ष पुराना है? अगर एक हिंदू राष्ट्र में हिंदू को इस तरह नवाजा जा रहा हो तो इससे अच्छा है कि वह एक मुस्लिम राष्ट्र में रहे क्योंकि वहाँ कम से कम बराबरी का ढोंग तो नहीं होगा, एक काफिर को वही मिलेगा जो उसे मिलना चाहिए। अपनी इस कड़वे बयान में आनंद रंगनाथन आजादी के बाद से हिंदुओं के साथ धोखेबाज़ी करने वाली ग्लानि भरी झूठी कहानी और आत्मदोषानुभूति पर एक निर्णायक प्रहार करते हुए उसे चकनाचूर कर देते हैं। यहाँ कोई स्वांग या राजनीतिक शुचिता नहीं है, अगर है तो केवल राज्य प्रायोजित नस्ल भेद की वह ठोस सच्चाई जिसके साथ हिंदू जी रहे हैं।

मोदी का बनारस

मोदी का बनारस -यह सिर्फ़ पुस्तक नहीं यात्रा है। गंगा यहाँ की जीवनरेखा है। गंगा, बाबा विश्वनाथ के बिना इस नगरी की कल्पना अधूरी है। नरेन्द्र मोदी का बनारस से चुनाव लड़ना राजनीति की असाधारण घटना है। बनारस का सामर्थ्य, कर्तव्य को पूरी दुनिया ने देखा है। अगर सोच लिया जाए, ठान लिया जाए, तो कुछ भी असंभव नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने बनारस में अपने तप से चुनाव तो जीता ही, साथ ही बनारस में अपने ख़िलाफ़ की जाने वाले दूसरी पार्टी नेताओं की साज़िशो को भी विफल कर दिया। देखते ही देखते मोदी ने अपने जीत का परचम बिहार, झारखंड, बंगाल तक फहरा दिया। मोदी की जीत एवं बनारस को लेकर लिए गए फ़ैसलों की कहानी है यह पुस्तक, जिसे हमेशा याद रखा जाएगा। यह पुस्तक आपको यह भी बताएगी कि बनारस से जीत की पटकथा कैसे लिखी गई, उसकी रूपरेखा किसने तैयार की थी। अमित शाह ने वर्ष 2010 में बनारस में क्या संकल्प लिया था। जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने ना दिन देखा ना रात। यूपी और बनारस का चुनाव जीतने के लिए अमित शाह ने राजनाथ सिंह से ऐसा क्या वचन लिया था, जिसे लेकर सबके बीच में उन्होंने कह दिया कि मैं होता तो यह वचन कभी नहीं देता। नरेंद्र मोदी ने कोविड काल के समय को ही बाबा विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प के लिए क्यों चुना। क्या आप को पता है कि बाबा विश्वनाथ मंदिर के लिए जमीन एकत्र करने के क्रम में जमीनों की सभी रजिस्ट्री एक विशेष समय में की गई थी। आखिर क्यों? क्या आप यह जानते हैं कि बनारस के विश्वनाथ मंदिर में कितना सोना लगा है? एक आश्रम का तिलिस्म जिसकी जमीन को खाली करवाने में एक साल लग गया। आखिर कैसे खाली हुई वह जमीन। कैसे पीएम मोदी ने आर्किटेक्ट के पहले बने नक्शे को खारिज कर दिया था। क्योटो में ऐसा क्या है जो उसे बनारस से जोड़ देता है। मोदी ने जापान के शहर क्योटो को ही क्यों चुना? बनारस का ऐसा घाट जहां पर आप हेलीकॉप्टर से पहुंच सकते हैं। फ़्रांस के राष्ट्रपति ने बनारस में ऐसा क्या पूछ लिया, जिसकी पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी। इन सब सवालों और जिज्ञासाओं का उत्तर आप को इस पुस्तक मोदी के बनारस में ही मिलेगा।

Chhutti Ke Din

अब एक नयी पुस्तकछुट्टी के दिनआपके हाथों में हैं| मातृभाषा की सेवा में डॉक्टर परीक्षित सिंह जी और कल्याण सिंह जी शेखावत के साथ| एक नयी जुगलबंदी हिन्दी और राजस्थानी की|जिसमें ढूंढ़े बिना ही सम्पूर्ण राजस्थान की महक मिलेगी|

Jana Awjanar Majhe

Jana Awjanar Majhe is a reflection of the author’s journey of life. It depicts his retrospective feeling about his past, and he tries to bring back those golden days in the mirror of the present. Having spent most of his childhood and adolescence in Kashi, the details of old Kashi are vibrant in the book.

Swayam Se Parichay

यह पुरातन ही नहीं आधुनिक भी है, छंदिक भी है तो मुक्त भी, आदर्शवादी भी है तो रहस्यमय भी, प्रयोगवादी भी है तो आध्यात्मिक भी | यह हृदय और मन को ही संतुष्ट नहीं करता, बल्कि कहीं उन गहराईयों को भी छू लेता है जिन्हें हम आत्मिक या चैत्य पौरुषिक कह सकते हैं। इसमें एक नए पद्य का उद्घोष है जिसमे गूढ़तम बातें हास्य के हल्केपन और सखा भाव की सरलता से कही गई हैं।

भारत के जनजातीय क्रान्तिवीर

भारतवर्ष को दासता के चंगुल से मुक्त कराने व स्वराज की स्थापना करने के लिए देश के असंख्य वीर सेनानियों व क्रांतिकारियों ने अपना जीवन भारत माता के चरणों में समर्पित किया है। किन्तु दुर्भाग्यवश, उनमें से बहुतसे योद्धा ऐसे हैं, जिन्हें मानक इतिहास पुस्तकों में किसी कारणवश उनका यथोचित नहीं मिल सका। यह बात देश के विभिन्न जनजातीय समुदायों से आने वाले क्रांतिवीरों के योगदान के विषय में और भी सटीकता से लागू होती है।

 

यह पुस्तक ऐसे ह जनजातीय क्रांतिवीरों की अल्पज्ञात अमरगाथाओं का यशोगान कर उन्हें जनसामान्य के समक्ष रखने एक छोटासा प्रयास है। अदम्य साहस, अतुलनीय शौर्य व अटूट स्वाभिमान से भर ये कथाएँ न केवल ज्ञानवर्द्धक हैं, अपितु सभी देशवासियों के लिए महान् प्रेरणास्रोत भी हैं।

Probashir Golpo Shongroho

Probashir Golpo Shongroho, a collection of more than 20 short stories, is a continuation of Bimal Chakravartty’s tales that began in his debut book, Jana Awjanar Majhe. Bengali is a sweet language – almost poetic – and these tales, each with a hint of a moral – right from ‘if you love someone then don’t hide it’ to ‘destruction has a music that is its very own for it heralds the beginning of something new’; from ‘sorry is still one of the hardest words to say’ to ‘widow remarriage continues to be a taboo’ – all add the right aroma to this book. The author might not have lived in Kolkata for many years, but his tales have the Kolkata flavour – it is anything but probashi. Read this collection of very simply told tales to appreciate youthful writing, where seriousness gets effortlessly interwoven with humour, written by a quintessential Bengali. If you know the bliss of eating bhaat-daal on a Sunday afternoon, then read the book, and if you don’t know, then read it and find out.