हिन्दू राष्ट्र: हिन्दुओं की रामकहानी

जो यह दावा करते हैं कि हम एक अधिनायकवादी हिंदू राष्ट्र में रह रहे हैं उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि यह किस प्रकार का हिंदू राष्ट्र है जहां एक अरब शक्तिशाली हिंदू यहाँ की संसद, अदालतों, शिक्षा व्यवस्था और हमारे संविधान द्वारा न सिर्फ दोयम दर्जे के नागरिक करार दिए गए हैं बल्कि उससे भी नीचे धकेल दिए गए? यह कैसा हिंदू राष्ट्र है जिसमें दुर्गा पूजा और गरबा के आयोजनों पर बेरोकटोक पत्थरबाजी की जाती है और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा एक शख्स कहता है कि इस देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है? यह कैसा हिंदू राष्ट्र है जहाँ हिंदुओं को अपनी ही धरती पर शरणार्थियों की तरह रहना पड़ता है और जहाँ कोई 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को तो बसा सकता है लेकिन इसी देश के धरतीपुत्र 7 लाख कश्मीरी पंडितों को नहीं और जहाँ अदालतों का कहना हैं कि हिंदुओं की हत्या, बलात्कार और जातीय संहार करने वालों पर मुकदमा चलाने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ हिंदुओं के मंदिर सरकारों के कब्जे में हैं और अपने त्यौहार मनाने के लिए हिंदुओं को वक्फ बोर्ड के सामने जमीन के लिए हाथ फैलाने पड़ते हैं? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ शिक्षा का अधिकार अधिनियम में केवल हिंदुओं के स्कूलों के साथ भेदभाव किया जाता है और उन्हें ताला लगाने को मजबूर कर दिया जाता है? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहां औरंगज़ेब और टीपू जैसे बर्बर शासकों को लेकर सरकारी खर्चे पर प्रकाशन किए जाते हैं, सड़कों के नाम रखे जाते हैं और त्योहारों का आयोजन होता है? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ एक ऐसा कानून बिल्कुल बन ही जाने ही वाला था जिसमें केवल हिंदुओं को, जबकि वे अल्पसंख्यक थे, सांप्रदायिक दंगों के लिए दोषी ठहराया जाता जैसा कि कश्मीर में देखा गया? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ सबरीमाला प्रकरण में अदालतों के फैसले और विधायी कानून केवल हिंदुओं के धर्माचारों में सुधार के लिए किए जाएँ लेकिन दूसरे धर्म को छुआ तक न जाए और अगर ऐसा कोई करे भी, तो वहाँ शाहबानो के मामले की तरह फैसले को पलट दिया जाए? यह किस तरह का हिंदू राष्ट्र है जहाँ हिंदू पूजा स्थल अधिनियम आज भी हिंदुओं को उनके प्रति हुए ऐतिहासिक अन्यायों को दुरुस्त करने के उनके विधिसम्मत अधिकार पर रोक लगता है जबकि वक्फ एक्ट मुसलमानों को एक 1500 वर्ष पुराने हिंदू मंदिर को इस्लामी संपदा घोषित करने की अनियंत्रित शक्ति दे देता है, गो कि इस्लाम अपने आप में महज 1300 वर्ष पुराना है? अगर एक हिंदू राष्ट्र में हिंदू को इस तरह नवाजा जा रहा हो तो इससे अच्छा है कि वह एक मुस्लिम राष्ट्र में रहे क्योंकि वहाँ कम से कम बराबरी का ढोंग तो नहीं होगा, एक काफिर को वही मिलेगा जो उसे मिलना चाहिए। अपनी इस कड़वे बयान में आनंद रंगनाथन आजादी के बाद से हिंदुओं के साथ धोखेबाज़ी करने वाली ग्लानि भरी झूठी कहानी और आत्मदोषानुभूति पर एक निर्णायक प्रहार करते हुए उसे चकनाचूर कर देते हैं। यहाँ कोई स्वांग या राजनीतिक शुचिता नहीं है, अगर है तो केवल राज्य प्रायोजित नस्ल भेद की वह ठोस सच्चाई जिसके साथ हिंदू जी रहे हैं।

मोदी का बनारस

मोदी का बनारस -यह सिर्फ़ पुस्तक नहीं यात्रा है। गंगा यहाँ की जीवनरेखा है। गंगा, बाबा विश्वनाथ के बिना इस नगरी की कल्पना अधूरी है। नरेन्द्र मोदी का बनारस से चुनाव लड़ना राजनीति की असाधारण घटना है। बनारस का सामर्थ्य, कर्तव्य को पूरी दुनिया ने देखा है। अगर सोच लिया जाए, ठान लिया जाए, तो कुछ भी असंभव नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने बनारस में अपने तप से चुनाव तो जीता ही, साथ ही बनारस में अपने ख़िलाफ़ की जाने वाले दूसरी पार्टी नेताओं की साज़िशो को भी विफल कर दिया। देखते ही देखते मोदी ने अपने जीत का परचम बिहार, झारखंड, बंगाल तक फहरा दिया। मोदी की जीत एवं बनारस को लेकर लिए गए फ़ैसलों की कहानी है यह पुस्तक, जिसे हमेशा याद रखा जाएगा। यह पुस्तक आपको यह भी बताएगी कि बनारस से जीत की पटकथा कैसे लिखी गई, उसकी रूपरेखा किसने तैयार की थी। अमित शाह ने वर्ष 2010 में बनारस में क्या संकल्प लिया था। जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने ना दिन देखा ना रात। यूपी और बनारस का चुनाव जीतने के लिए अमित शाह ने राजनाथ सिंह से ऐसा क्या वचन लिया था, जिसे लेकर सबके बीच में उन्होंने कह दिया कि मैं होता तो यह वचन कभी नहीं देता। नरेंद्र मोदी ने कोविड काल के समय को ही बाबा विश्वनाथ मंदिर के कायाकल्प के लिए क्यों चुना। क्या आप को पता है कि बाबा विश्वनाथ मंदिर के लिए जमीन एकत्र करने के क्रम में जमीनों की सभी रजिस्ट्री एक विशेष समय में की गई थी। आखिर क्यों? क्या आप यह जानते हैं कि बनारस के विश्वनाथ मंदिर में कितना सोना लगा है? एक आश्रम का तिलिस्म जिसकी जमीन को खाली करवाने में एक साल लग गया। आखिर कैसे खाली हुई वह जमीन। कैसे पीएम मोदी ने आर्किटेक्ट के पहले बने नक्शे को खारिज कर दिया था। क्योटो में ऐसा क्या है जो उसे बनारस से जोड़ देता है। मोदी ने जापान के शहर क्योटो को ही क्यों चुना? बनारस का ऐसा घाट जहां पर आप हेलीकॉप्टर से पहुंच सकते हैं। फ़्रांस के राष्ट्रपति ने बनारस में ऐसा क्या पूछ लिया, जिसकी पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी। इन सब सवालों और जिज्ञासाओं का उत्तर आप को इस पुस्तक मोदी के बनारस में ही मिलेगा।

Modian Consensus

Modian Consensus: The Rediscovery Of Bharat maps the Indian political trajectory of the last 150 years. It locates various periods of consensus that developed in Bharat from time to time and drove the policy, planning and politics of the day. Four of these consensus phases of the past have been identified as Civilisational Consensus, Gandhian Consensus, Nehruvian Consensus and Secular Consensus. The fifth and ongoing phase, the book argues, is Modian Consensus. The book examines how the politics of the day finds itself willy-nilly amidst a consensus around the politics of Narendra Modi. In the current phase, parties and politicians diametrically opposed to Modi’s ideas are compelled to follow the line of policies and programmes set by him. The impact of this consensus can be observed far beyond the domain of politics as it stands on the three postulates of cultural rootedness, assertive nationalism and welfare for all. The book explores various manifestations of Modian Consensus, including the challenges it faces and what it augurs for the future of Indian politics.

Adhyatmikta

Adhyatmikta:Explorations into Hindu Spiritual Practices looks at the fundamental questions and issues faced by a dharmic spiritual practitioner in today’s age. It guides one to navigate the spiritual path with a judicious mix of practical experience and guidance from the traditions and texts. The book also contains detailed articles on devatas in Hinduism.

Hindus in Hindu Rashtra

To those who claim we are now living in a totalitarian, fascist, Hindu Rashtra, one must ask: What kind of a Hindu Rashtra is this where a billion-strong Hindus have been, through our parliament, through our courts, our education system, and our constitution, reduced to not just second-class but, rather, eighth-class citizens? What kind of Hindu Rashtra is this where Ram Navami, Hanuman Jayanti, Durga pooja processions, and even Garba celebrations, are attacked and stoned with impunity? What kind of Hindu Rashtra is this where a sitting Prime minister says minorities have the first right to resources? What kind of Hindu Rashtra is this where Hindus are forced to be refugees in their own land, where one can settle 40,000 Rohingya Muslims but not 700,000 Kashmiri Hindus, the land’s original inhabitants; where the judiciary says it is too late to prosecute those who raped, murdered, and ethnically cleansed lacs of Hindus? What kind of Hindu Rashtra is this where Hindu temples are exclusively controlled by the State, where Hindus must beg for Waqf land to celebrate their festival while the government usurps hundreds of thousands of acres of temple land and is responsible for more than 100,000 temples losing lakhs of crores in rental income? What kind of Hindu Rashtra is this where the Right to Education Act discriminates only against Hindus and their schools, forcing tens of thousands of them to shut down? What kind of Hindu Rashtra is this where monsters like Aurangzeb and Tipu who perpetrated large-scale Hindu genocides are eulogised through State sponsored publications, naming of roads and cities, and organising of festivals? What kind of Hindu Rashtra is this where a law was about to be enacted through with only the Hindus would have been held guilty in a communal riot even if they were in a minority for example in Kashmir? What kind of Hindu Rashtra is this where court judgments like the Sabarimala and legislative enactments like the Hindu Code Bill purport to reform only Hindu religious practices but dare not touch practices of other religions, and if they do, the decisions are promptly reversed like in the Shah Bano case? What kind of Hindu Rashtra is this where The Places of Worship Act continues to deny the Hindus their legitimate right to correct historical injustices and reclaim thousands of demolished temples? What kind of Hindu Rashtra is this where the Waqf Act gives overarching powers to Muslims to declare a 1500-year-old Hindu temple to be on Islamic land when Islam is only 1300 years old? If this is how a Hindu is rewarded in a Hindu Rashtra, he’d much rather be in a Muslim Rashtra because then at least there’d be no pretence of equality – a Kafir will get what he deserves. In this searing commentary penned with clinical precision, the author shreds to smithereens once and for all the guilt-tripping, self-loathing fake narrative that Hindus have been duped with since Independence. There is no pretence, no political correctness, only unvarnished truth – that the Hindus are living under State-sanctioned Apartheid.

Somewhere Among the Stars

“When I first shared this story with a monk-friend, he asked me why I wrote it as fiction and not biography. Many others who read this book may have the same query. So let me share: the first reason was the most obvious one — Ahana hardly lived an outer life, her entire life unfolded within, in her consciousness. Outwardly, her biography could be written in a single paragraph: She was born in India, in the early sixties, to academic parents and grew up in a university environment. She met a young man when she turned eighteen, perhaps fell in love, and left her studies and social life to live in an obscure ashram in the Himalayas and explore Vedanta. She then left the ashram and came to Almora, a small Himalayan town, where she lived alone in a cottage.

 

Inwardly, however, Ahana’s life was rich, fascinating, multihued, multilayered, profoundly inspiring. The more I discovered and understood of her life, the more I realized how much is possible, and how much the human being can attain, in a single lifetime — none could come to her and remain unchanged. So how does one write a biography of such a being?

 

 And second, as I discovered in writing this book, a biography ties you down to facts and timelines while fiction can free you of all such needless fetters. Ahana’s life, I feel, is the stuff poetry is made of.”

The Eternal Feminine

A woman is not just a form and a figure; though her form itself is significant of deep-guarded secrets and the capacity to create marvels out of a seed state. She is the Force, Shakti, Wisdom, Strength, Beauty, Love, Delight that is everywhere and in all beings. This book is not just an attempt to discover and evoke her through myths and legends of India, but to unravel the mysteries of the ‘Eternal Feminine’ with a view to discover the truth behind what a woman truly represents as seen through the awakened eyes of the mystics and the spiritual culture of India.

Symbols and Parables

India is a land of stories which, apart from their age-old charm, are a simple way of communicating profound truths. This book is an attempt to bring alive some of the deepest mysteries of existence through the narrative of stories.

जीत मोदी शासन की

गहन शोध और विश्लेषण पर आधारित ‘जीत मोदी शासन की: समृद्धि के अभिनव पथ पर भारत’ पुस्तक मोदी सरकार की प्रमुख पहलों, सुधारों और नवाचारों का व्यापक विश्लेषण करती है, जिन्होंने भारत के सामाजिक, आर्थिक और राजनीति क परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ अभियान से लेकर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के माध्यम से कर प्रणाली में बड़े बदलाव तक, हर अध्याय एक ऐसे नेता की कहानी को प्रस्तुत करता है जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में शासन के मायने ही बदल दिए हैं।

 

यह पुस्तक न केवल मोदी सरकार की उपलब्धियों पर प्रकाश डालती है, बल्कि उनके कार्यकाल के दौरान सामने आई चुनौतियों और विवादों का भी समग्र मूल्यांकन करती है। यह उन सभी के लिए एक आवश्यक पुस्तक है जो भारत में हो रहे परिवर्तनों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमि का को समझने में रुचि रखते हैं, जो देश के भविष्य को नया आकार देने में महत्वपूर्ण भूमि का निभा रहे हैं।

Reclaiming Bharatavarsha

Reclaiming Bharatavarsha is a collection of topical and exploratory essays organized around three broad themes. The first explores various facets of classical Bharatavarsha, which is defined as India before the advent of alien Islamic invaders and British colonisation. The second delves into the condition of an India under successive alien regimes. The impact of these regimes on our culture and society is contrasted with the conditions prevailing in the preceding classical era. The third studies the imprint of these bouts of foreign rule on contemporary national life. The three themes taken separately are complementary, and together they offer a scope for comparative analyses of the politics, culture, society, customs, and literature of different eras in the life of this ancient land.

 

From selected episodes drawn from the Puranas and the Mahabharata to the sacred history of the banana, from the 17th-century Bengali arrack to woke cinema, from the 1962 war with China to hair dyes, the book offers an eclectic mix of atypical essays, the narratives of which are filled with rare anecdotes and vivid details, all of which are backed by scholarly research.

 

The book also has a contemporary context—the unprecedented transformation of India over the last decade. A major outcome of this transformation is the surge in interest for recovering India’s national and civilizational past. This collective resurgence is an expression of cultural self-confidence, which had fallen by the wayside for centuries. Reclaiming Bharatavarsha is a humble addition to this national endeavour.

Rearming Hinduism

Rearming Hinduism is a handbook for intellectual resistance. Within its pages, Vamsee Juluri delivers a sharp and comprehensive examination of Hinduphobia pervasive in contemporary academia, media, and popular culture. Juluri not only exposes the Hinduphobic narrative’s denial of the profound truths and beauty within Hindu philosophy but also challenges its disregard for the inherent integrity and sacredness of the natural world. This book fearlessly dismantles prevalent misconceptions about nature, history, and ancient civilizations propagated by modern media while debunking Hinduphobic myths surrounding Aryans, invasions, and ritual practices. Through this critique, Rearming Hinduism draws connections between Hinduphobia and a culture marked by exploitation and self-destruction, suggesting that a revitalized Hindu perspective may offer a potent counterforce. It urges readers to envision the present through the lens of timeless principles, thereby uplifting our understanding of our land, time, and the enduring values of sanatana dharma.

Desires, Dreams and Powers

Desires, Dreams and Powers is a fascinating saga of the life and times of Tathagata Roy. Not many people may have traipsed into so many fields of life as Roy has. He has been a civil engineer, an encyclopaedic, a university teacher, a researcher, a contract lawyer, a politician, an author in two languages, an intrepid traveller and, lately, a history buff.

 

By writing about his times than his life, Roy covers truly eventful eight decades of a nation in transition, during which British rule transmogrified into the partitions of India and Bengal, the world around him transformed from writing with a quill pen to taming the personal computer and toying with AI, and politics from optimism to Naxalism to hope. His native West Bengal, the crucible of left ideology, finally exorcised the ghost of Marxism by overthrowing the Left Front united in 2011 after 34 years of unbroken communist rule. Through it all, he pranced into high school, segued into engineering college, got his first job with the Indian railways, taught at Jadavpur University, joined the Bharatiya Janata Party and capped it all up by becoming the governor of three north-eastern states of India.

 

The book is as much about the trajectory of a nation on the move as it is about Roy’s life. The parallel is unmissable.

Krishna-Niti

How often have you been advised to follow the teachings of Krishna but wondered what those teachings were? Krishna-Niti: Timeless Strategic Wisdom brings forth eleven of the most important lessons delivered by Krishna at critical junctures in the Mahabharata. These practical lessons are different from the spiritual wisdom imparted to Arjuna in the celebrated Bhagavad-Gita. Whether negotiating for peace between the Kauravas and Pandavas, resolving internal conflicts in the Pandava camp, or inspiring Yudhishthira to rule as a Dharmaraja (righteous ruler) at the end of the Kuruskshetra war, Krishna emerges as the strategist par excellence, who is as worldly wise as he is spiritually enlightened.

 

Krishna’s instructions cover a wide range of subjects, including ethics, strategy, governance, policy, and above all dharma. However, throughout its wide scope, Krishna-Niti is governed by an underlying worldview, which can be summarised as jnana-karma-samuchchaya, or the right combination of knowledge and action to achieve the fourfold goals of human life. Krishna argues that karma is essential to life and natural order. Steadfastness in one’s karma is the key to the attainment of one’s goals whether material or spiritual. Escapism or inaction is not an option, neither is indecisiveness stemming from unending intellectual debates. In no case should one abandon one’s duty by citing a lack of good options.

 

Krishna’s role in the Mahabharata is not just as a knower of dharma (dharmajna) but as its upholder and institutor (dharma-samsthapaka). Therefore, unlike other great works on niti, Krishna’s instructions are not theoretical but have an immediate relation to the situation at hand. His guidance is always delivered to a particular character in the epic, especially in moments of crisis, internal dissension, or war. This implies that we get to see the principles of Krishna-Niti in action throughout the epic.

 

The authors, Kushagra Aniket and Nityananda Misra, draw upon their extensive research into the Mahabharata to present a unique gem of Nitishastra that is distilled from the quintessential Itihasa of India. They analyse Krishna’s practical wisdom through his interventions on numerous occasions. Rooted in the vision of the epic, Krishna-Niti: Timeless Strategic Wisdom paints the authentic picture of Krishna as a statesman—an enduring image that is deeply relevant to our times.

Whispers from the Past

Whispers from the Past is an overture to the history and culture of classical Kashmir, which for over a thousand years was one of the most creative places in the world. Through the book, the author hopes to acquaint the reader with Kashmir’s contributions to art and aesthetics, including drama, music, painting, sculpture, sciences, yoga, tantra, literature, and philosophy. The region’s culture was premised on the idea that universal consciousness binds humanity together, and knowing this at the individual’s level is fundamental to self-understanding and for creative growth. Classical Kashmiri artists appreciated great art not merely from its inherent cleverness points of view but for its capacity to inspire audiences to the source of creativity itself, and this entailed devotion to excellence and a robust tradition of criticism. The book explores the currents of intellectual life and the lives of prominent royals, writers, and sages, showing how Kashmiri scholars and travellers came to influence not only southern regions but also far-away lands beyond the Himalayas. It showcases Kashmir’s famed storytelling tradition through abridged tales from the Panchatantra, Kathā-sarit-sāgara, and Yoga Vāsiṣṭha, the last of which is arguably the greatest book of imagination and wisdom ever written on the conundrums of consciousness with unequalled clarity. Kashmiri aesthetics and the search for meaning in life resonate with modern sensibility

My Freedom of Expression

My Freedom of Expression is a collection of 22 articles published in recent years mostly by the Statesman newspaper. The anthology—varied in its themes ranging from Indic civilization to democracy, scientific temper to religious bigotry and identity to governance—is an exploration of what holds India back to become a global leader. The author picked some of contemporary’s most contentious topics, such as global warming, scientific marvels, the mysteries of life and the universe, cultural and religious superstitions, illusions and prejudices in the practise of science, and the importance of religion in society, and dissected them one by one with a rationalist knife. So what his writings essentially do is show a mirror to society. By being both accessible and arresting at once, the book deserves a place in everyone’s library.

प्रतीक्षा शिवाची

ज्या सहजतेने काशी किंवा वाराणसी आपल्या इतिहासाचे प्रचंड ओझे वाहते, तशी जगातील फार थोडी ठिकाणे असतील. ही नगरी आपल्या संस्कृतीच्या आत्म्याचे आणि शतकानुशतके आलेली विपरीत परिस्थिती, हल्ले सहन करूनही पुन्हापुन्हा उभी राहत आपल्या अपराजित वृत्तीचे दर्शन घडवते. 

 

 प्रतीक्षा शिवाचीकाशीज्ञानवापीच्या सत्याचा शोधया पुस्तकाच्या माध्यमातून विश्वेश्वर किंवा विश्वनाथाच्या रुपातील शिवाचा अधिवास असणाऱ्या काशीचा इतिहास, तिची प्राचीनता आणि पावित्र्याचे दर्शन घडते. जो या शहरात आपला देह ठेवतो त्याला मोक्ष मिळेल असे वचन प्रत्यक्ष शिव देतो. हे पुस्तक या स्वयंभू ज्योतिर्लिंग विश्वेश्वराच्या इतिहासाचा सखोल शोध घेते. आपल्या भक्तांचे आश्रयस्थान असलेले हे विश्वेश्वर मंदिर हे नेहमीच धर्मांध मूर्तीभंजकांच्या निशाण्यावर राहिलेले आहे. परंतु जेव्हा जेव्हा हे मंदिर उद्ध्वस्त करून त्याचे अस्तित्व पुसून टाकण्याचा प्रयत्न झाला तेव्हा तेव्हा हे मंदिर पुन्हा उभे राहिले आणि भरभराटीला आले. 

 

मंदिराच्या इतिहासातील या प्रलयंकारी घटनांचा लेखाजोखाप्रतीक्षा शिवाचीहे पुस्तक मांडते. जुलमी मुघल बादशाह औरंगजेबाने १६६९ मध्ये या मंदिरावर घातलेला घाव वर्मी बसला आहे. त्याने मंदिर फोडले आणि मंदिराच्या पश्चिमेकडील अर्धवट तुटलेल्या भिंतीवर घुमट उभे करून त्याला मशिदीचे रूप दिले. आज ज्याला ज्ञानवापी मशीद म्हणतात ती मशीद आणि त्याच्या आजूबाजूची आणि अठराव्या शतकात बांधल्या गेलेल्या नव्या विश्वनाथ मंदिराजवळची जागा यावरून नेहमीच वादंग माजलेला आहे. भूतकाळात या मुद्द्यावरून अनेक वेळा रक्तरंजित दंगली झाल्या आहेत. इंग्रजी सत्तेच्या काळातही या जमिनीच्या मालकी आणि ताब्याच्या मुद्द्यावरून अनेक वेळा ब्रिटिश न्यायालयांचे दरवाजे ठोठावले गेले आहेत, त्यासंबंधीचे खटले चालवले गेले आहेत. स्वातंत्र्यानंतरही हा पूर्ण परिसर मुक्त करावा अशी मनीषा हिंदूंच्या मनात कायमच वास करत आली आहे. २०२१ ला नव्याने दाखल करण्यात आलेल्या एका खटल्याने या फार काळापासून ठसठसणाऱ्या जखमेवरची खपली निघाली. भारतीय पुरातत्व विभागाकडून सर्वेक्षण होऊ नये यासाठी अगदी सर्वोच्च न्यायालयापर्यंत वारंवार अपीले करूनही हे सर्वेक्षण झाले आणि जानेवारी २०२४ मध्ये या सर्वेक्षणाने या पूर्ण प्रकरणातील सत्य उजेडात आणले. 

 

विक्रम संपतचे हे नवे पुस्तक या मंदिराचा बहुपेडी इतिहास, त्यात आलेली नाट्यमय वळणे, घडलेल्या गूढ घडामोडी, या जागेवरून झालेले कडाक्याचे वादविवाद या साऱ्या गोष्टी उलगडून दाखवते. कितीतरी काळ ज्ञानवापीमध्ये दडपून आणि लपवून ठेवलेल्या या गुपितांना या पुस्तकाच्या रूपाने वाचा फुटली आहे.

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